संपादकीय
मन ही बंधन है, मन ही मुक्ति: आंतरिक अनुशासन की साधना
योग पर एक प्रीमियम द्विभाषी पाठ जो यह दिखाता है कि अनदेखा मन कैसे बंधन बन जाता है, और अभ्यास तथा वैराग्य उसी मन को अनुशासित सहयोगी कैसे बना देते हैं।

श्लोक
Yoga Sutra 1.4
वृत्तिसारूप्यमितरत्र।
वृत्ति-सारूप्यम् इतरत्र
हिंदी अर्थ
अन्यथा द्रष्टा मन की वृत्तियों के समान रूप ग्रहण कर लेता है।
अनदेखे विचार का ख़तरा यही है कि वह मानसिक घटना को पहचान बना देता है। योग वह दूरी लौटाता है जिसकी मुक्ति के लिए ज़रूरत है।
Bhagavad Gita 6.5
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्. आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
हिंदी अर्थ
मनुष्य को अपने आप को ऊपर उठाना चाहिए, अपने आप को गिराना नहीं चाहिए; आत्मा ही आत्मा की मित्र भी हो सकती है और शत्रु भी।
गीता भीतरी काम को ज़िम्मेदारी में बदल देती है। आप बाहर से उद्धार की प्रतीक्षा नहीं करते; आप स्वयं को इतना साधते हैं कि वह विनाशकारी नहीं, सहायक बन जाए।
Yoga Sutra 1.12
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः।
अभ्यास-वैराग्याभ्यां तन्निरोधः
हिंदी अर्थ
मन की वृत्तियों का निरोध अभ्यास और वैराग्य से होता है।
अभ्यास स्थिरता लाता है; वैराग्य आसक्ति की पकड़ ढीली करता है। दोनों मिलकर मन को कम प्रतिक्रियात्मक और अधिक स्पष्ट बनाते हैं।
खंड
शुरुआत
खंड
एक छोटा प्रयोग
खंड
अदृश्य बंधन
खंड
पतंजलि वास्तव में क्या कह रहे हैं

खंड
गीता इसमें क्या जोड़ती है

खंड
योग के दो पंख
- अभ्यास: बार-बार उस ओर लौटना जो महत्वपूर्ण है।
- वैराग्य: नियंत्रित करने, पकड़ने, या चिपकने की ज़रूरत छोड़ना।
- अभ्यास बिना वैराग्य के आसक्ति बन जाता है।
- अभ्यास के बिना वैराग्य निष्क्रियता में बदल सकता है।
- दोनों मिलकर स्थिरता बनाते हैं।
खंड
साक्षी भाव
खंड
दैनिक अभ्यास: 7 दिन के लिए 3 मिनट
- तीन मिनट शांति से बैठिए।
- विचारों को दबाए बिना देखिए।
- जो आए उसे नाम दीजिए: सोच, योजना, स्मृति, चिंता, निर्णय।
- ध्यान को श्वास पर लौटाइए।
- मन से लड़िए नहीं। उसे प्रशिक्षित कीजिए।
- लक्ष्य मौन नहीं है। लक्ष्य जागरूकता है।
खंड
मुख्य निष्कर्ष
- विचार घटनाएँ हैं, पहचान नहीं।
- अनदेखा सोचना बंधन बनाता है।
- जागरूकता मानसिक प्रतिक्रिया से दूरी बनाती है।
- अभ्यास स्थिरता बनाता है।
- वैराग्य दुख घटाता है।
- साक्षी भाव भीतरी मुक्ति की नींव है।
- योग शारीरिक व्यायाम भर नहीं, ध्यान का अनुशासन है।
खंड
निष्कर्ष
संपादकीय दिशा के लिए प्रयुक्त संदर्भ